खेत से बाजरा की बाली लेकर लौट रही नाबालिग लड़की के साथ गांव के ही युवक ने की छेड़खानी लड़की के आरोप के मुताबिक लड़की के साथ किया बलात्कार

खेत से बाजरा की बाली लेकर लौट रही नाबालिग लड़की के साथ गांव के ही युवक ने की छेड़खानी


लड़की के आरोप के मुताबिक लड़की के साथ किया बलात्कार


परिजनों ने दी कालपी कोतवाली में तहरीर,नही हुई कोई सुनवाई


दिल पत्थर करना पड़ता है,सांसों को थाम लेना पड़ता है,शब्द खुद निशब्द हो जाते हैं जब एक बेबस बाप अपनी बेटी पर हुई जुल्म की दास्तान सुनाता है।बताता है कि बेटियों के सम्मान पर नारे गढ़ने वालों की संवेदनशीलता जब गौड़ हो जाती है तो अपराधी बेखौफ हो जाते हैं।क्या कोई सोच सकता है,क्या कोई बता सकता है कि जिस्म को नोचने वाले गिद्ध चौराहे पर खड़े होकर जब अट्ठहास करते हैं तो बेटियों पर क्या गुजरती होगी,कोई बता सकता है कैसे उन बेड़ियों को तोड़ा जाएगा जो लंबे अरसे से इस मुल्क की बेटियों के पैरों में बांध दी गई हैं,क्या समाज में घूम रहे दरिंदों से बचने का एक ही तरीका है चुप रहो,खामोश रहो,घर को अपनी चारदीवारी समझ लो फिलहाल जानते हैं हम,घुटता होगा दम एक काम करना बिटिया बेटी बन कर ना लेना अगला जन्म क्योंकि सरकार त्यौहार में व्यस्त है,अफसर सरकारी मद में मस्त हैं,पिता सुस्त और बेटियां जुल्म के आगे पस्त हैं।*


*इस आजाद मुल्क में कोई बताएगा कि बेटियों की आजादी कब तक मुकम्मल होगी,संविधान सिसक पड़ा है,कानून की छाती धक्का रह गई कि हमारी रक्षा करने वाले कैसे जश्न बना सकते हैं आजादी का जबकि 71 साल बाद भी बेटियां आजाद नहीं हैं।दरअसल जनपद जालौन के कालपी तहसील के अंतर्गत ग्राम मैंनूपुर की एक पंद्रह वर्षीय बेटी आज दोपहर दो बजे अपने खेत से बाजरा की बाली लेने जा रही थी तभी घात लगाए युवक अमित ने लडकी के साथ पहले छेड़खानी की जिसका विरोध किया तो मारपीट की फिर घसीटते हुए अपने घर के अंदर ले गया जिसके बाद उसके जिस्म को नोचा और जब दरिंदगी की सारी भूख खत्म हो गयी तो छोड़ दिया।*


*सड़क का बिछौना बनाकर न्याय की गुहार लेकर अपने परिजनों के साथ शाम सात बजे कालपी कोतवाली पहुंची थी ये बेटी,अपने ऊपर हुई जुल्म की इंतेहा सुनाने ये बताने कि बेटी होने का मतलब आज भी ये समाज पैरों की जूती समझता है फिलहाल वहां तैनात खाकी की फौज ने इस बेटी से पहले ली तहरीर फिर ठंड का हवाला देकर बोल दिया कि हो जाएगी कार्यवाही।अंदर सरकारी फौज मौज काटती रही बाहर बेटी इंसाफ मांगती रही,इंसान से पत्थर हो चुके पुलिस वालों पर कोई फर्क नही पड़ा खैर आंखों से गिरते आंसू ने बेटी को इस उम्र में सिखा दिया कि कानून का मतलब मजाक होता है खैर चौराहे पर घूम रहे दरिंदो पर हाँथ डालने से डरने वालों गांव में पल रहे हैवानो के आगे नतमस्तक हो गए फिलहाल बेटी की सिसकियों पर चाय की चुस्कियां ली गईं,बिलखने के लिए छोड़ दिया बेटी को परिजनों के साथ।मांग रही थी जीने का अधिकार कि सुनो सरकार गांव में पल रहे हैवान जीने नही देते और पुलिस वाले कुछ सुनने को तैयार नही जाएं तो कहाँ जाएं,बोलो सरकार बोलो फिलहाल देख लो सूबे की सरकार,करती है बेटियां दरकार कब मिलेगा उनको जीने का अधिकार ये है सूरतहाल बेहाल उत्तरप्रदेश का और आप कहते है कि उत्तरप्रदेश अपराध मुक्त प्रदेश बन चुका है।


 


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