सरकार को समर्पित यह कविता''

"सरकार को समर्पित यह कविता''


हाल क्या है वतन का न पूछो कोई
उंगली उनपे उठाना गजब ढा गया।
तीन सौ सत्तर हटाना चलो ठीक था,
कै को फिर बनाना गजब ढा गया।।


शक भरी सब नजर है तुम्हारी तरफ
और तुम्हारी अकड़ है हमारी तरफ।
नोटबंदी तुम्हारी भी कुछ कम न थी,
फिर जीएसटी लगाना गजब ढा गया।।


ज़ीडीपी पर नहीं है इनकी नजर,
नौकरी क्यों है  लूटी अरे बेखबर।
जिस देखो वही अब तो हैरान है
जुमला उनका सुनाना गजब ढा गया।।


अब तो खुशियां नहीं है मेरै गांव में,
नहीं बजते हैं घुंघरू किसी पांव में।
जुल्म पहले भी उनपे कभी कम न थै
अब पराली जलाना गजब ढा गया।।


घर से निकली है बेटी सुरक्षित नहीं,
क्यों हिफाजत है कम, ये बताओ सही।
मैं तड़पता बहुत हूं मगर क्या करूं,
हांडी फिर से चढ़ाना गजब ढा गया।।


       


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