मौलिक अधिकारों की रक्षा नहीं की तो खत्म हो जाएगा संविधान का महत्व : सुप्रीम कोर्ट

 मौलिक अधिकारों की रक्षा नहीं की तो खत्म हो जाएगा संविधान का महत्व : सुप्रीम कोर्ट
 वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में बोलने के अधिकार को रेग्यूलेट (नियंत्रित) करने की बात का समर्थन करते हुए कहा कि अब राज्य के लिए देश के विधिशास्त्र के विकास के अगले फेज में जाने का समय आ गया है और परोक्ष रूप से राज्य की भूमिका अदा कर रहने वालों पर भी मौलिक अधिकारों के संरक्षण का दायित्व दिया जाना चाहिए। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर जीवन के अधिकार और फेयर ट्रायल जैसे मौलिक अधिकारों का निवारण नहीं किया गया तो संविधान अपना महत्व खो देगा।
 साल्वे ने जस्टिस अरूण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ से कहा, 'अब तक हम राज्य के खिलाफ लड़ते रहे हैं लेकिन आज चुनौती यह हो गई है कि अधिकारों का सम्मान देने में राज्य की भूमिका कम हो रही है। हमें अपनी चुनौतियों को फिर से गढ़ने की जरूरत है।’
 साल्वे ने कहा कि भोजन, शेल्टर, प्रतिष्ठा, सम्मान, स्वास्थ्य, निष्पक्ष जांच, फेयर ट्रायल और स्वच्छ पर्यावरण संविधान में निहित नहीं हैं लेकिन मनुष्य के अस्तित्व को देखते हुए इन्हें अधिकार के दायरे में लाया गया। साल्वे ने कहा कि संविधान निर्माताओं के लिए यह समझ से बाहर था कि बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी का इस तरह विस्तार होगा।
साल्वे ने ये बातें उस संविधान पीठ के समक्ष कही जो इस बात का परीक्षण कर रही है कि उच्च पदों पर आसीन व्यक्ति क्या सरकारी नीति और विधान के खिलाफ बयान दे सकता है। क्या ऐसा व्यक्ति जो उच्च पद पर बैठा है या मंत्री है वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधार पर वैसे आपराधिक मामले में अपना विचार रख सकता है जिसकी जांच चल रही हो। यह मामला तब उठा था जब उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री आजम खान ने बुलंदशहर गैंगरेप में पीड़िता की विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठाया था। साल्वे इस मामले में अमाइकस क्यूरी के तौर पर अदालत की मदद कर रहे हैं।
साल्वे ने तमस, फायर, पद्मावत आदि फिल्मों के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए कहा कि इस तरह से संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन होने पर अदालत मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती और राज्य यह कह कर अपना पल्ला नहीं झाड़ सकते कि उल्लंघन प्राइवेट पार्टी द्वारा किया जा रहा 
साल्वे ने कहा कि ऐसी स्थिति आ सकती है जब संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति, जो लोगों को संविधान के तहत अधिकार दिलाने की शपथ लेता है, को बोलने के अपने अधिकार का इस्तेमाल संवैधानिक शपथ के अनुरूप करना होता है। सरकार के लिए मानवाधिकार का पालन कराना उसकी जिम्मेदारी है और लोगों को फेयर ट्रायल का मौका दिया जाए।
: साल्वे ने कहा कि हर आदमी की जिंदगी में निजी बातचीत होती है और किसी एजेंसी को जानकारी मिले तो क्या वह कह सकता है कि जानकारी है इसलिए वह उसे सार्वजनिक कर देगा। निजता का अधिकार अनुच्छेद-21 के तहत मिला हुआ है और अनुच्छेद-21 का उल्लंघन नही किया जा सकता।
: इस पर पीठ ने कहा कि अगर किसी नागरिक के अनुच्छेद-21 के तहत मिले अधिकार का उल्लंघन होता है और अनुच्छेद-19(2) के तहत अभिव्यक्ति के अधिकार के अपवाद में तहत नहीं होता तो फिर हम नहीं कह सकते हैं कि कानून बनाया जाए? साल्वे ने दलील दी कि कोर्ट कानून बनाने की सिफारिश कर सकती है। अदालत विशाखा गाइडलाइंस में दे चुकी है। साल्वे ने कहा कि इस तरह का अधिकार संविधान की आत्मा और दिल है।
: सुनवाई के दौरान जस्टिस अरुण मिश्रा ने साल्वे से कहा कि आपके कहने का मतलब है कि अगर कोई पब्लिक ड्यूटी जैसे रेलवे, टोल कलेक्शन आदि प्राइवेट पार्टी करती है तो उन्हें अधिकार संरक्षित करने के लिए जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए। 


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