हां, कठिन होगा वृक्ष, पौधे व पंछियों के बिना जीवन! पक्षियों का शिकार बिना गोली-तीर चलाए हुए कर डाला,पेड़ों को उजाड़ कर!!

हां, कठिन होगा वृक्ष, पौधे व पंछियों के बिना जीवन!


पक्षियों का शिकार बिना गोली-तीर चलाए हुए कर डाला,पेड़ों को उजाड़ कर!!


पिछले साल अर्थव्यवस्था में जिस तरह मंदी की शुरुआत हुई, बैंक घोटाले हुए, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के डूबने का संकट गहराया, इन सब घटनाओं ने लोगों के मन में अर्थव्यवस्था को लेकर संदेह पैदा किया है। पंजाब एवं महाराष्ट्र कोऑपरेटिव बैंक (पीएमसी) के घोटाले से सहकारी बैंकों से भी आम जनता का भरोसा डिगा है। सुबह-सुबह पंछियों के बोल हमेशा ही अधिक सुहाते रहे हैं। बोलों की वह मधुर गुंजार वातावरण को एक माधुरी, एक चहक सौंपती ही रही है, अगर मौसम खुशनुमा हो और उसके अनुकूल मंद बयार हो, तो वह कुल वातावरण को महका भी देती रही है; जिसका एक सहज स्मरण प्रसाद जी की ये पंक्तियां आज भी करा देती है- ‘खग कुल कुल कुल सा बोल रहा/ किसलय का अंचल डोल रहा/ लो वह लतिका भी भर लायी/ मधु-मुकुल नवल रस गागरी/ बीती विभावरी जाग री!’
ये पंक्तियां यह याद भी दिला देती हैं कि ‘किसलय का अंचल’ हो या ‘लतिका’ और ‘मधु मुकुल’- ये सब अब एक स्थान पर कम ही मिलते हैं। यही कारण है कि अब पंछियों की वैसी चहचहाहट कम ही सुनाई पड़ती है। और ‘खग कुल कुल’- वह तो तभी कलरव करेगा न, जब होंगे किसलय, लताएं, वृक्ष, पौधे, होंगे उनमें खिले हुए फूल। महानगरीय और शहरी स्थानों में, इनमें कमी आई है, तो पंछियों में भी कमी आई है! हां, पंछी आते ही वहीं है, जहां हो भरी-पूरी हरीतिमा, चुगने को, चोंच मारने को, फल-फूल, और हो जल! ‘वह जल’ जल-पंछियों के लिए तो जरूरी है ही, अन्य पंछियों को भी चाहिए! शहरों-महानगरों के बीच अब वैसे जल-कुंड, सरोवर और कुएं भी नहीं हैं, जैसे एक जमाने में हुआ करते थे और  महानगरो में अभी भी कुछ बचे हुए हैं। सो, पंछियों के लिए एक आकर्षण और कम हुआ है!आज के समय ने पक्षियों का शिकार बिना गोली-तीर चलाए हुए कर डाला है, पेड़ों को उजाड़ कर!इसलिए भी जरूरत है अब सोच-विचार कर ऐसे वृक्ष लगाने की जहां पक्षी बसें, घोंसला बनाएं, आसपास रहें। ऐसे वृक्ष भी हों जो उन्हें फल-फूल दें, चुगने को, कुतरने को। हां, कठिन होगा पंछियों के बिना जीवन! भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कब लिखी थीं ये सुंदर मधु सुघड़ पंक्तियां: ‘गूंजहि भंवर विहंगम डोलहिं बोलहिं प्रकृति बधाई/ पुतली सी जित तित तितली गत फिरहिं सुगंध लुभाई।’ हां, डोलें विहंगम, गूंजें भंवरे, पुतली-सी जहां तहां फिरें तितलियां, सुगंध के लोभ में। इसी दृश्य की फिर कामना है।


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