राज्यसभा में बिल पास होने के बाद इसमें राष्ट्रपति की मुहर लगना जरूरी है. इसके बाद ही कोई बिल यानी विधेयक कानून का रूप लेता है.

राष्ट्रपति की मुहर जरूरी


राज्यसभा में बिल पास होने के बाद इसमें राष्ट्रपति की मुहर लगना जरूरी है. इसके बाद ही कोई बिल यानी विधेयक कानून का रूप लेता है. ये दोनों सदनों की साझा बैठक के बाद ही राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है. राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद ही विधेयक कानून का रूप ले लेता है, फिर ये पूरे देश में लागू होता है.


जब इस राष्ट्रपति ने नहीं किया था हस्ताक्षर


साल 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई थी. ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार के बाद देश में उनके खिलाफ माहौल काफी खराब हो गया था. ऐसे में देश के पहले सिख राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह पर इस्तीफा देने का दबाव बढ़ रहा था. वो इंदिरा गांधी से बेतरह नाराज थे. ज्ञानी जैल सिंह को उनके समर्थकों ने समझाया कि ऐसे वक्त में ये अगर सियासी कदम उठाने से सिखों और गैरसिखों के बीच की फांक और गहरी हो जाएगी. वो फिर भी स्वर्णमंदिर गए. इसके बाद इंदिरा गांधी को 31 अक्टूबर को उनके अपने ही सुरक्षा दस्ते के दो जवानों (जो धर्म से सिख थे) ने गोली मार दी थी. उस वक्त राष्ट्रपति ओमान के राजकीय दौरे पर थे और इंदिरा के राजनीतिक वारिस राजीव गांधी पं. बंगाल के दौरे पर थे. राजीव गांधी वापस आए और बिना राष्ट्रपति का इंतजार किए, उपराष्ट्रपति से प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी गई.


इससे राजीव और तत्कालीन राष्ट्रपति के बीच राजनीतिक खाईं और भी गहरी हो गई. एक संवैधानिक व्यवस्था के सहारे ज्ञानी जैल सिंह ने सरकार पर नकेल कसनी शुरू की. इसी कड़ी में जब राजीव सरकार ने राज्यसभा में पास हो चुका पोस्टल एमेंडमेंट बिल भेजा तो ज्ञानी जैल सिंह ने वीटो का इस्तेमाल कर दिया. इस पॉवर से राष्ट्रपति स्वीकृति के लिए आए किसी बिल को अनियमित काल तक अपने पास रोक सकते हैं.


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