परोक्ष रूप से महापौर चुनना लोकतंत्र का अपमान

 


 परोक्ष रूप से महापौर चुनना लोकतंत्र का अपमान करना है


यह फैसला पूरी तरह से लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाने वाला है जिसको आप इस आधार पर ला रहे हैं 


      क्योंकि आपने कहा कि पार्टी के बड़े नेता पार्षद बनने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं क्योंकि उनको हार का डर है


    . अरे लोकतंत्र में बड़े नेता कौन होते हैं जो जनता से समर्थन प्राप्त करते हैं या उनको बड़े नेता कहेंगे जो नेताओं की चमचागिरी करके और वही पद हथिया लेते हैं


      अरे भाई जब जनता ही नकार चुकी वही व्यक्ति चमचागिरी तेरा सहारा की तर्ज पर महापौर बन जाएगा


      मतलब जिस को मतलब पार्षदों को जनता ने जिताया है महापौर उन्हीं की छाती पर मूंग दलेगा
 यह कौन सा लोकतंत्र ?


 मतलब ऊपर वाले की चमचागिरी करके महापौर का पद हथिया लो उसके बाद में ऊपर वाले की तरफ देखो जैसा वह कहे वैसे एक तरह से कठपुतली की तरह काम करते रहो 


    अरे भाई यह लोकतंत्र में हो क्या रहा है हर आदमी अपना हित देख रहे हैं 


    केंद्र में सत्ताधारी दल को अरे जिसके पास में जितना अधिकार है उसका दुरुपयोग करने में कोई पीछे नहीं है और यह जो नियम है वह पूरी तरह से जो पार्टी के कर्मठ सक्रिय कार्यकर्ता है उनकी छाती पर मूंग दलने के बराबर  है 


    अब जो पार्षद चुनाव जीतकर आएंगे उनसे यह कहा जाएगा कि जो पार्षद का चुनाव हार गया जो कोई चुनाव जिंदगी में जीता नहीं उसको आप महापौर बनाओ


     क्योंकि हाई कमांड यह  चाहता है 


      अरे भाई हाईकमान अगर यह चाहता है तो उसको लोकतंत्र का पता नहीं है क्या कि लोकतंत्र में तो वही बात चाही जानी चाहिए जिसको जनता चाहती है


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